राकेश डिकेट ने क्यों दिए भड़काऊ बयान?किसान के अड्डे पर पुलिस का कब्ज़ा ?in 2021

राकेश डिकेट ने क्यों दिए भड़काऊ बयान?

 किसान के अड्डे पर पुलिस का कब्ज़ा कल देर रात तक पुलिस और CRF के जवान ऐसे तैनात किये गए है बहुत भरी मात्रा में पुलिस की टोली मगाई गयी है पुलिस फुल्ली एक्शन में है 26 जनवरी को जो हुआ पुलिस ने कई नेता को हिरासत में भी लिया है और आगे की करवाई चल रही है आखिर हुआ क्या था 26 जनवरी को क्या किसान पर दबाद दिया गया  महात्मा गांधी अगर आज होते तो किसान आन्दोलन उन्हीं के नेतृत्व में होता. क्योंकि महात्मा गांधी ने जीवन भर अन्याय, अत्याचार और सरकार की निरंकुशता के विरोध में आवाज़ उठाई है. अंग्रेजों की सभी  दमनकारी नीतियों और उनके काले कानूनों की मुखालफ़त की है. सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलनों से ब्रिटिश हुकूमत को हिन्दोस्तान से उखाड़ फेका है. काले कानून सिर्फ अंग्रेज़ों ने नहीं बनाये थे. बल्कि समय के साथ सभी निरंकुश सत्ताधीशों और सरकारों ने बहुमत के अहंकार में काले कानून बनाये हैं और अपनी जनता पर लागू किये हैं. जनता ने भी सड़कों पर उतरकर सभी काले कानूनों का विरोध किया. सत्ता की शक्ति का दुरुपयोग करने वाले शासकों को सबक सिखाया है और उनकी सत्ता को देश निकला भी दिया है. आज समय फिर अपने को दोहरा रहा है देश की संसद ने एक बार फिर निरंकुश नेताओं का साथ दिया है. लोकतंत्र का मज़ाक उड़ाया है. बहुमत को आधार बताकर कमज़ोर विपक्ष को शून्य किया है यदि सड़कें सूनी हो जायें तो संसद आवारा हो जाती है. इसका मतलब यदि संसद को मर्यादित सुचारू और जनहित में चलाना है तो विपक्ष को समय समय पर सड़कों पर उतरना ही होगा. सरकार संसद से चलती है तो विपक्ष का काम सड़कों पर चलता है. पिछले छह सालों में विपक्ष सड़कों से नदारत रहा, जनहित के मुद्दे सड़कों पर उछाले नहीं गए, देश का मिडिया जनहित के  समस्याओं को छोड़कर हिन्दू-मुस्लिम विषयों पर शोध करता रहा. धार्मिक उन्माद फैलाता रहा. किसी भी सरकार को निरंकुश बनाने के लिये इतना काफी है. परिणाम स्वरूप देश की संसद ने तीन कृषि कानून बनाये जिसे किसानों ने काले कानूनों की संज्ञा दी है. और उन्हीं काले कानूनों का विरोध करने के लिए किसान खेतों से सड़क पर आ गए हैं. दो महीने से ज़्यादा का समय हो गया किसान सड़कों पर है किसानों का ये शांतिपूर्ण आंदोलन एक मिसाल बन गया था. किसानों की इस शांति से सरकार अशांत हो रही थी.. और फिर 26 जनवरी को किसानों की ट्रेक्टर रेली में क्या हुआ, पूरा देश जानता है देश ये भी जानता है कि लालकिले पर तिरंगे का अपमान किसने किया और किसके इशारे पर किया. लालकिले की घटना के पीछे किसकी साज़िश है देश सब जानता है लेकिन इस साज़िश का इलज़ाम किसानों के मढ़ा जा रहा है. किसानों के सभी बड़े नेताओं पर कई संगीन धाराओं में केस दर्ज हो चुका है. किसी भी समय किसी भी किसान नेता को गिरफ्तार किया जा सकता है. पुलिस के द्वारा सरकार किसानों पर दमनकारी नीति चला रही है. सिंघु बोर्डर, टीकरी बोर्डर, गाज़ियाबाद बोर्डर इन सभी धरना स्थलों को पुलिस छावनी में बदल दिया गया है. धरना स्थल का पानी और लाइट कनेक्शन काट दिया गया है. धरना पर बैठे किसानों को डराया जा रहा है. जिससे कई किसान धीरे धीरे अपने घरों को लौटने लगे हैं. इसी का फायदा उठाकर गाज़ियाबाद बोर्डर पर किसान नेता राकेश टिकैत को गिरफ्तार करने पुलिस पहुँच गयी. राकेश टिकैत सरकार की इस दमनकारी व्यवस्था से दुखी होकर भावनात्मक टूटने लगें है और मीडिया से मुखातिब होकर अपने दुख को व्यक्त करते हुए रो पड़े. राकेश टिकैत के आंसुओं ने ऐसा असर दिखाया कि अपने घरों को लौटते हुए किसान वापस धरना स्थलों पर आ गये. रात में ही गाँव-गाँव में किसान इकठ्ठा होने लगे और सभी किसान अपने अपने वाहनों में बैठकर वापस दिल्ली की तरफ आने लगे. इससे किसान नेताओं का हौसला बढ़ गया और पुलिस का षड्यंत्र विफल हुआ. किसान अन्दोलन फिर अपनी आबो-ताब के साथ आगे बढ़ने लगा है. किसानों की मांगे सरकार के सामने यक्ष प्रश्न के सामान अडिग खड़ी हैं. और सरकार एक बार फिर डिगती हुई दिखाई देने लगी है आप के हिसाब के जो आप ने टीवी या हमारी पोस्ट में पढ़ा है आप के हिसाब से गुनेगार कौन है खालिस्थान या किसान हमें कमेंट में बताया। 

Leave a Comment

x